छेरछेरा: छत्तीसगढ़ का ‘महादान’ पर्व – परंपरा, संस्कृति और सरगुजा की माटी का उल्लास
Blogछेरता पर्व (छेरछेरा) | Chherta (Chherchhera)– छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति का आत्मीय पर्व छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी परंपराएँ आज भी यहाँ की पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं। इन्हीं परंपराओं में एक अत्यंत लोकप्रिय और आत्मीय लोकपर्व है छेरता (Chherta), जिसे आम बोलचाल में छेरछेरा भी कहा जाता है। यह पर्व केवल मांगने या देने का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, सहयोग और लोकजीवन की सामूहिक भावना का प्रतीक है। छत्तीसगढ़, जिसे हम ‘धान का कटोरा’ कहते हैं, यहाँ की संस्कृति में कृषि और उत्सव एक-दूसरे के पूरक हैं। जब खेतों में सुनहरी फसल लहलहाकर खलिहानों तक पहुँचती है और किसानों की मेहनत सफल होती है, तब छत्तीसगढ़ की धरती एक अनूठे स्वर में गा उठती है— “छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेर हेरा!” पौष मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला छेरछेरा का त्यौहार केवल एक स्थानीय पर्व नहीं है, बल्कि यह दान की महिमा, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक महाअनुष्ठान है। आज MyAmbikapur.com के इस विशेष ब्लॉग में, हम छेरछेरा के इतिहास, धार्मिक महत्व, लोक मान्यताओं और अंबिकापुर समेत पूरे सरगुजा संभाग में इसके रंगारंग स्वरूप पर विस्तार से चर्चा करेंगे। छेरछेरा (छेरता) का अर्थ ‘छेरछेरा’ (Chherchhera) शब्द सुनते ही छत्तीसगढ़ी मानस में एक चित्र उभरता है— हाथ में झोला लिए बच्चों की टोलियाँ और द्वारों पर दान करते गृहस्थ। ‘छेर’ का अर्थ होता है मांगना और ‘छेरा’ का मतलब है दान देना। यानी यह पर्व मांगने और देने के संतुलन का पर्व है। छेरछेरा का मूल भाव यह सिखाता है कि समाज में किसी को भी भूखा या वंचित नहीं रहना चाहिए। एक अन्य मान्यता अनुसार – ‘छेर’ और ‘छेरा’ का शाब्दिक अर्थ ‘छह’ और ‘छह’ के योग से भी जोड़ा जाता है, लेकिन लोक संस्कृति में यह ‘छय’ (नष्ट होना) और ‘अक्षय’ (कभी समाप्त न होना) के दर्शन को भी दर्शाता है। छेरता पर्व की परंपरा कैसे निभाई जाती है? छेरछेरा के दिन बच्चे, युवक और कभी-कभी बुजुर्ग भी समूह बनाकर घर-घर जाते हैं और पारंपरिक स्वर में छेरता मांगते हैं। यह एक तरह से नारे जैसा होता है जिससे लोगों को पता चलता है कि घर में छेरता मांगने वाले लोग आये हैं। इस दिन का मुख्य नारा है: “छेरछेरा, कोठी के धान ल हेर हेरा, अरन बरन कोदो करन, जब्भे देबे तब्भे टरन।” इसका अर्थ है: “छेरछेरा आ गया है, अपनी कोठी से धान बाहर निकालिए। अन्न-दान कीजिए, जब आप दान देंगे तभी हम आपके द्वार से अगले द्वार की ओर बढ़ेंगे।” इसके बदले में घर के लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार धान, चावल, चिउड़ा, तिल, गुण इत्यादि का दान करते हैं। यह सब बहुत ही हँसी-खुशी और सम्मान के साथ किया जाता है। ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि छेरछेरा (Chherchhera) के पीछे कई पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं, जो इस त्यौहार को आध्यात्मिक गहराई प्रदान करते हैं। माता अन्नपूर्णा (शाकंभरी) का अवतरण धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पौष पूर्णिमा के दिन ही माता पार्वती ने शाकंभरी के रूप में अवतार लिया था। कहा जाता है कि जब पृथ्वी पर भीषण अकाल पड़ा, तब माता ने अन्न की अधिष्ठात्री देवी बनकर धरती को हरा-भरा किया और भूखे जीवों को अन्न प्रदान किया। इसी स्मृति में लोग दान-पुण्य करते हैं ताकि उनके घर में कभी अन्न की कमी न हो। राजा कल्याण साय की ऐतिहासिक कथा एक अन्य किंवदंती छत्तीसगढ़ के रत्नपुर (रतनपुर) राज्य के राजा कल्याण साय से जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा कल्याण साय मुगल दरबार में काफी समय बिताने के बाद जब वापस अपनी राजधानी रत्नपुर लौटे, तो प्रजा ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया। राजा ने खुशी में अपनी प्रजा को स्वर्ण मुद्राएं और अन्न दान किया। उसी दिन से प्रजा की खुशहाली के प्रतीक के रूप में घर-घर जाकर अन्न मांगने और दान देने की यह परंपरा (Chherta) शुरू हुई। छेरछेरा की तैयारी और अनुष्ठान छेरछेरा त्यौहार की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। चूंकि यह फसल कटाई के तुरंत बाद आता है, इसलिए किसानों के घरों में संपन्नता का वास होता है। लोक परंपरा: टोलियों का भ्रमण और लोकड़ी नृत्य छेरछेरा (Chherchhera) की असली रौनक गलियों में होती है। इस पर्व को अलग-अलग टोलियों के माध्यम से समझा जा सकता है: बच्चों की छेरता की टोली (Children’s Chherta Group) छोटे बच्चे सबसे पहले तैयार होकर निकलते हैं। वे घर-घर जाकर उत्साहपूर्वक “छेरछेरा” चिल्लाते हैं। यह उद्घोष स्थान के अनुसार भिन्न हो सकता है। अंबिकापुर के आसपास के क्षेत्रों में बच्चे “छेर छेरता” चिल्लाते हैं। बच्चे दिन के अलग अलग समय में अलग अलग चीज मांगते हैं। प्रायः सुबह से दोपहर के समय बच्चे पहले चिउड़ा मांगते हैं फिर चावल और इसके बाद कहीं कहीं धान भी मांगते हैं।गृहणियां प्रेमपूर्वक बच्चों के झोलों में मुट्ठी भर-भरकर धान, चावल या चिवड़ा और गुड़ डालती हैं। इसके बाद बच्चे खुश होकर अगले घर की ओर प्रस्थान करते हैं। लोकड़ी नृत्य की टोली लोकड़ी नृत्य छेरता के दिन रात्रि के समय में होता है। लोकड़ी नृत्य में लोकड़ी गीतों का गायन भी टोली द्वारा किया जाता है। लोकड़ी में ज्यादातर बच्चे भाग लेते हैं लेकिन कभी कभी युवाओं की टोली भी लोकड़ी नृत्य करती है। एक टोली में सामान्यतः 5-10 सदस्य होते हैं । इससे कम या ज्यादा सदस्य भी हो सकते हैं। ये टोली घर घर जाकर लोकड़ी गीतों के साथ नृत्य प्रस्तुत करती है। कुछ लोग अपने साथ वाद्य यंत्र भी रखते हैं। लोकड़ी नृत्य में गीतों के माध्यम से लोकड़ी मांगा जाता है (सामान्यतः धान और चावल)। घर के मालिक अपने सामर्थ्य अनुसार धान और चावल देते हैं। एक घर से धान और चावल मिलने के बाद टोली दूसरे घर जाती है। इस तरह पूरे गांव में भ्रमण किया जाता है। लोकड़ी से प्राप्त धान और चावल इत्यादि से होने वाली आय से प्रायः बच्चे पिकनिक करते हैं। दान की वैज्ञानिक और सामाजिक महत्ता क्या छेरछेरा (Chherta) केवल मांगने का त्यौहार है? बिल्कुल नहीं। इसके पीछे गहरा सामाजिक दर्शन छिपा है: अंबिकापुर और सरगुजा अंचल में छेरता का महत्व (Importance of Chherta festival in Ambikapur and Surguja) अंबिकापुर और पूरे सरगुजा अंचल में छेरता (Chherta )का विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है। यहाँ यह पर्व केवल एक रस्म
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