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सांडबार मंदिर अम्बिकापुर – प्रकृति, आस्था और लोकविश्वास का अद्भुत संगम

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अंबिकापुर शहर के शांत और हरियाली से भरे सांडबार क्षेत्र में स्थित सांडबार मंदिर स्थानीय लोगों की गहरी आस्था और सदियों पुराने विश्वास का प्रतीक है। वन देवी को समर्पित यह स्थान प्रकृति, लोककथाओं और आध्यात्मिक शांति का एक दुर्लभ मेल प्रस्तुत करता है। मंदिर का वातावरण ऐसा है कि यहां पहुँचकर मन अपने आप ही शांत होने लगता है। परिचय — क्यों खास है सांडबार मंदिर? सांडबार मंदिर की खासियत इसकी भव्यता में नहीं, बल्कि इसकी सरलता और प्राकृतिक सौंदर्य में है। घने पेड़ों की छांव और शांत वातावरण मिलकर इसे एक ऐसा धार्मिक स्थल बनाते हैं जहाँ भक्त सिर्फ दर्शन ही नहीं, बल्कि मन की शांति भी पाते हैं। यहाँ आने वाले भक्तों का विश्वास है कि वन देवी रक्षा, समृद्धि और स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। यही कारण है कि त्योहारों, खासकर नवरात्रि में यहाँ भारी संख्या में श्रद्धालु उमड़ते हैं। सांडबार मंदिर का इतिहास और लोककथा — वन देवी की आस्था कैसे बनी? इस स्थान के बारे में कई लोककथाएँ प्रचलित हैं। माना जाता है कि बहुत पुराने समय में आसपास के जंगलों में देवी का एक प्राकृतिक रूप प्रकट हुआ था। ग्रामीणों ने जब इस स्थान पर चमत्कारिक घटनाएँ महसूस कीं, तब यहाँ देवी की स्थापना की गई। कहानी यह भी है कि कई बार जंगल में भटकने वाले पशु इस स्थल के पास आकर शांत हो जाते थे, जिसके बाद लोगों ने माता को वन संरक्षक देवी मानकर पूजन प्रारंभ किया। समय के साथ यह छोटा सा पूजा-स्थल एक मंदिर का रूप ले लिया। वर्तमान में यहां कई मंदिर हैं। आप यहां कई मंदिरों में एक साथ दर्शन का लाभ ले सकते हैं। सांडबार मंदिर परिसर — सादगी में सुंदरता मंदिर परिसर आधुनिकता से दूर, प्रकृति के बिल्कुल करीब है। यहाँ की मुख्य विशेषताएँ— यहाँ आने पर लगता है जैसे शहर की भागदौड़ से दूर किसी दूसरी दुनिया में प्रवेश कर गए हों। धार्मिक महत्व — क्यों लाखों का विश्वास जुड़ा है? वनेश्वरी देवी माता के प्रति यहाँ के लोगों में अत्यधिक श्रद्धा है। माना जाता है कि वनेश्वरी देवी माता अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनती हैं। भक्त जन यहाँ मन्नत मांगते हैं। अनेक भक्तों की मन्नतें पूरी भी हुई हैं। भक्त अपनी मनोकामनाएँ पूरी होने पर यहाँ नारियल और प्रसाद चढ़ाते हैं। कुछ लोग यहां बकरे की बलि भी देते हैं। भक्त मानते हैं कि यहाँ माँ: नवरात्रि में यहाँ विशेष पूजा, भजन संध्या और माता की आराधना का आयोजन होता है। त्यौहार और आयोजन — जब मंदिर में उमड़ता है उत्साह सांडबार मंदिर में पूरे वर्ष भक्त आते हैं, लेकिन कुछ अवसर ऐसे हैं जब यहाँ की रौनक देखते ही बनती है— 1. नवरात्रि – सबसे बड़ा उत्सव 2. सुंदरकांड पाठ और हवन स्थानीय भक्त समय-समय पर यहाँ सुंदरकांड पाठ का आयोजन करते हैं। 3. वृक्षारोपण और सेवा कार्य क्योंकि यह मंदिर प्रकृति के बीच स्थित है, इसलिए सामाजिक संगठन यहाँ वृक्षारोपण और सेवा कार्यक्रम भी करते हैं। कैसे पहुँचें? – मार्ग व दूरी सांडबार मंदिर अंबिकापुर शहर के भीतर से आसानी से पहुँचा जा सकता है। अंबिकापुर बस स्टैंड से दूरी: लगभग 6–8 किमी रेलवे स्टेशन से दूरी: स्थानीय ऑटो/ई-रिक्शा उपलब्ध: हाँ सड़क अच्छी है और वाहन सीधे मंदिर तक जा सकते हैं। भ्रमण सुझाव (Travel Tips) आसपास घूमने योग्य स्थान अगर आप मंदिर घूमने जा रहे हैं, तो आसपास ये जगहें भी देख सकते हैं— महामाया मंदिर, अंबिकापुर शंकर घाट रामगढ़ राम मंदिर अम्बिकापुर शनि मंदिर अम्बिकापुर शिव मंदिर लब्जी निष्कर्ष — सांडबार मंदिर क्यों अवश्य देखना चाहिए? सांडबार मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ का स्थान नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, शांति और आस्था का सुन्दर संगम है। यहाँ आकर एक अलग ही दिव्यता का अनुभव होता है। यदि आप अंबिकापुर या आसपास के क्षेत्र में रहते हैं, तो इस मंदिर की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। यह स्थान आपका मन शांत करेगा, ऊर्जा देगा और अापको प्रकृति के और करीब ले जाएगा।

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छेरछेरा: छत्तीसगढ़ का ‘महादान’ पर्व – परंपरा, संस्कृति और सरगुजा की माटी का उल्लास

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छेरता पर्व (छेरछेरा) | Chherta (Chherchhera)– छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति का आत्मीय पर्व छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी परंपराएँ आज भी यहाँ की पहचान को जीवंत बनाए हुए हैं। इन्हीं परंपराओं में एक अत्यंत लोकप्रिय और आत्मीय लोकपर्व है छेरता (Chherta), जिसे आम बोलचाल में छेरछेरा भी कहा जाता है। यह पर्व केवल मांगने या देने का उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक समानता, सहयोग और लोकजीवन की सामूहिक भावना का प्रतीक है। छत्तीसगढ़, जिसे हम ‘धान का कटोरा’ कहते हैं, यहाँ की संस्कृति में कृषि और उत्सव एक-दूसरे के पूरक हैं। जब खेतों में सुनहरी फसल लहलहाकर खलिहानों तक पहुँचती है और किसानों की मेहनत सफल होती है, तब छत्तीसगढ़ की धरती एक अनूठे स्वर में गा उठती है— “छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेर हेरा!” पौष मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला छेरछेरा का त्यौहार केवल एक स्थानीय पर्व नहीं है, बल्कि यह दान की महिमा, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक महाअनुष्ठान है। आज MyAmbikapur.com के इस विशेष ब्लॉग में, हम छेरछेरा के इतिहास, धार्मिक महत्व, लोक मान्यताओं और अंबिकापुर समेत पूरे सरगुजा संभाग में इसके रंगारंग स्वरूप पर विस्तार से चर्चा करेंगे। छेरछेरा (छेरता) का अर्थ ‘छेरछेरा’ (Chherchhera) शब्द सुनते ही छत्तीसगढ़ी मानस में एक चित्र उभरता है— हाथ में झोला लिए बच्चों की टोलियाँ और द्वारों पर दान करते गृहस्थ। ‘छेर’ का अर्थ होता है मांगना और ‘छेरा’ का मतलब है दान देना। यानी यह पर्व मांगने और देने के संतुलन का पर्व है। छेरछेरा का मूल भाव यह सिखाता है कि समाज में किसी को भी भूखा या वंचित नहीं रहना चाहिए। एक अन्य मान्यता अनुसार – ‘छेर’ और ‘छेरा’ का शाब्दिक अर्थ ‘छह’ और ‘छह’ के योग से भी जोड़ा जाता है, लेकिन लोक संस्कृति में यह ‘छय’ (नष्ट होना) और ‘अक्षय’ (कभी समाप्त न होना) के दर्शन को भी दर्शाता है। छेरता पर्व की परंपरा कैसे निभाई जाती है? छेरछेरा के दिन बच्चे, युवक और कभी-कभी बुजुर्ग भी समूह बनाकर घर-घर जाते हैं और पारंपरिक स्वर में छेरता मांगते हैं। यह एक तरह से नारे जैसा होता है जिससे लोगों को पता चलता है कि घर में छेरता मांगने वाले लोग आये हैं। इस दिन का मुख्य नारा है: “छेरछेरा, कोठी के धान ल हेर हेरा, अरन बरन कोदो करन, जब्भे देबे तब्भे टरन।” इसका अर्थ है: “छेरछेरा आ गया है, अपनी कोठी से धान बाहर निकालिए। अन्न-दान कीजिए, जब आप दान देंगे तभी हम आपके द्वार से अगले द्वार की ओर बढ़ेंगे।” इसके बदले में घर के लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार धान, चावल, चिउड़ा, तिल, गुण इत्यादि का दान करते हैं। यह सब बहुत ही हँसी-खुशी और सम्मान के साथ किया जाता है। ऐतिहासिक और पौराणिक पृष्ठभूमि छेरछेरा (Chherchhera) के पीछे कई पौराणिक कथाएं और ऐतिहासिक संदर्भ मिलते हैं, जो इस त्यौहार को आध्यात्मिक गहराई प्रदान करते हैं। माता अन्नपूर्णा (शाकंभरी) का अवतरण धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पौष पूर्णिमा के दिन ही माता पार्वती ने शाकंभरी के रूप में अवतार लिया था। कहा जाता है कि जब पृथ्वी पर भीषण अकाल पड़ा, तब माता ने अन्न की अधिष्ठात्री देवी बनकर धरती को हरा-भरा किया और भूखे जीवों को अन्न प्रदान किया। इसी स्मृति में लोग दान-पुण्य करते हैं ताकि उनके घर में कभी अन्न की कमी न हो। राजा कल्याण साय की ऐतिहासिक कथा एक अन्य किंवदंती छत्तीसगढ़ के रत्नपुर (रतनपुर) राज्य के राजा कल्याण साय से जुड़ी है। कहा जाता है कि राजा कल्याण साय मुगल दरबार में काफी समय बिताने के बाद जब वापस अपनी राजधानी रत्नपुर लौटे, तो प्रजा ने उनका अभूतपूर्व स्वागत किया। राजा ने खुशी में अपनी प्रजा को स्वर्ण मुद्राएं और अन्न दान किया। उसी दिन से प्रजा की खुशहाली के प्रतीक के रूप में घर-घर जाकर अन्न मांगने और दान देने की यह परंपरा (Chherta) शुरू हुई। छेरछेरा की तैयारी और अनुष्ठान छेरछेरा त्यौहार की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। चूंकि यह फसल कटाई के तुरंत बाद आता है, इसलिए किसानों के घरों में संपन्नता का वास होता है। लोक परंपरा: टोलियों का भ्रमण और लोकड़ी नृत्य छेरछेरा (Chherchhera) की असली रौनक गलियों में होती है। इस पर्व को अलग-अलग टोलियों के माध्यम से समझा जा सकता है: बच्चों की छेरता की टोली (Children’s Chherta Group) छोटे बच्चे सबसे पहले तैयार होकर निकलते हैं। वे घर-घर जाकर उत्साहपूर्वक “छेरछेरा” चिल्लाते हैं। यह उद्घोष स्थान के अनुसार भिन्न हो सकता है। अंबिकापुर के आसपास के क्षेत्रों में बच्चे “छेर छेरता” चिल्लाते हैं। बच्चे दिन के अलग अलग समय में अलग अलग चीज मांगते हैं। प्रायः सुबह से दोपहर के समय बच्चे पहले चिउड़ा मांगते हैं फिर चावल और इसके बाद कहीं कहीं धान भी मांगते हैं।गृहणियां प्रेमपूर्वक बच्चों के झोलों में मुट्ठी भर-भरकर धान, चावल या चिवड़ा और गुड़ डालती हैं। इसके बाद बच्चे खुश होकर अगले घर की ओर प्रस्थान करते हैं। लोकड़ी नृत्य की टोली लोकड़ी नृत्य छेरता के दिन रात्रि के समय में होता है। लोकड़ी नृत्य में लोकड़ी गीतों का गायन भी टोली द्वारा किया जाता है। लोकड़ी में ज्यादातर बच्चे भाग लेते हैं लेकिन कभी कभी युवाओं की टोली भी लोकड़ी नृत्य करती है। एक टोली में सामान्यतः 5-10 सदस्य होते हैं । इससे कम या ज्यादा सदस्य भी हो सकते हैं। ये टोली घर घर जाकर लोकड़ी गीतों के साथ नृत्य प्रस्तुत करती है। कुछ लोग अपने साथ वाद्य यंत्र भी रखते हैं। लोकड़ी नृत्य में गीतों के माध्यम से लोकड़ी मांगा जाता है (सामान्यतः धान और चावल)। घर के मालिक अपने सामर्थ्य अनुसार धान और चावल देते हैं। एक घर से धान और चावल मिलने के बाद टोली दूसरे घर जाती है। इस तरह पूरे गांव में भ्रमण किया जाता है। लोकड़ी से प्राप्त धान और चावल इत्यादि से होने वाली आय से प्रायः बच्चे पिकनिक करते हैं। दान की वैज्ञानिक और सामाजिक महत्ता क्या छेरछेरा (Chherta) केवल मांगने का त्यौहार है? बिल्कुल नहीं। इसके पीछे गहरा सामाजिक दर्शन छिपा है: अंबिकापुर और सरगुजा अंचल में छेरता का महत्व (Importance of Chherta festival in Ambikapur and Surguja) अंबिकापुर और पूरे सरगुजा अंचल में छेरता (Chherta )का विशेष सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है। यहाँ यह पर्व केवल एक रस्म

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CGBSE 10th 12th Board Exam 2026 Preparation Tips: छत्तीसगढ़ बोर्ड में ज्यादा मार्क्स कैसे पाएं?

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बोर्ड परीक्षाएँ (10वीं और 12वीं) विद्यार्थियों के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ होती हैं। ये न केवल ज्ञान का आकलन करती हैं, बल्कि भविष्य के करियर की नींव भी रखती हैं। सही रणनीति, योजना और माता-पिता के सहयोग से इन परीक्षाओं में शानदार सफलता प्राप्त की जा सकती है।

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Shankar Ghat, Ambikapur – एक शांत और धार्मिक स्थान

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क्या आप अंबिकापुर शहर के शोर से दूर, शांति और आध्यात्म की तलाश में हैं? तब आपको शंकर घाट ज़रूर जाना चाहिए। यह सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है, बल्कि एक ऐसा स्थान है जहाँ प्रकृति, आस्था और इतिहास का एक अनोखा संगम देखने को मिलता है। Myambikapur.com आपको इस दिव्य घाट की यात्रा पर ले चलता है। Shankar Ghat का परिचय Shankar Ghat Ambikapur शहर के किनारे स्थित एक शांत और आध्यात्मिक स्थान है। यहाँ नदी के किनारे बने घाट, हरियाली से घिरे रास्ते, और भगवान शिव का मंदिर—यहां आने वाले हर व्यक्ति को आध्यात्मिक सुकून प्रदान करते हैं। सुबह और शाम के समय घाट का नज़ारा इतना सुंदर होता है कि कई लोग यहाँ ध्यान, वॉक और योग करने आते हैं। Shankar Ghat क्यों खास है? आस्था का प्रमुख केंद्र शंकर घाट अम्बिकापुर (Shankar ghat ambikapur) का शिव मंदिर स्थानीय लोगों के बीच काफी लोकप्रिय है। महाशिवरात्रि, सावन सोमवार जैसे शुभ अवसरों पर यहां काफी भीड़ रहती है। भक्त जलाभिषेक करते हैं, प्रार्थना करते हैं और मंदिर परिसर के शांत वातावरण में बैठकर मन को स्थिर करते हैं। मंदिर का अद्भुत वातावरण और महत्व : शंकर घाट अंबिकापुर में स्थित है, और इसकी खासियत इसे शहर के अन्य मंदिरों से अलग करती है और इसे Best places in Ambikapur में शुमार करती है – नदी के किनारे : यह घाट एक अविरल नदी की धारा के किनारे स्थित है, जो यहाँ के वातावरण को अत्यंत शांत और पवित्र बनाती है। पीपल की छाँव : यहाँ भगवान भोलेनाथ एक विशाल पीपल वृक्ष की घनी, शीतल छाँव में विराजमान हैं। श्मशान से जुड़ाव: यह स्थान श्मशान भूमि के पास स्थित है, जो भगवान शिव के ‘महाकाल’ स्वरूप के अनुरूप है। हिंदू शास्त्रों में, भगवान शिव को श्मशान का अधिपति (Lord of Cremation Grounds) माना जाता है, और यह संयोग इस मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा को और भी बढ़ा देता है। धार्मिक मान्यता: जानकारों के अनुसार, श्मशान के समीप, नदी की धारा और पीपल की छाँव में भगवान शिव का विराजित होना अत्यंत शुभकारी और दुर्लभ माना जाता है। यह स्थान जीवन और मरण के चक्र का प्रतीक है। सूर्य मंदिर और छठ पूजा घाट शंकर घाट छठ महापर्व के लिए एक प्रमुख स्थान है। यहां नदी के घाट को छठ महापर्व के समय बहुत ही सुंदर तरीके से सजाया है। यहाँ सूर्य मंदिर भी है। छठ महापर्व के समय यहाँ श्रद्धालुओं की बहुत भीड़ होती है। प्राकृतिक खूबसूरती का बेजोड़ अनुभव Shankar Ghat Ambikapur की सबसे सुंदर बात है नदी के किनारे बैठने का अद्भुत सुकून। ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जहाँ कोई भी तनाव दूर हो जाता है। Morning Walk और Meditation का बेहतरीन स्थल Ambikapur शहर के कई लोग रोज सुबह Shankar Ghat आते हैं। इस जगह को morning walk के लिए एक अच्छी जगह बनाते हैं। सुबह का समय इस जगह को और भी सुंदर बना देता है। Photography के लिए Perfect Spot यहां सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों का नज़ारा बेहद शानदार होता है। Travel bloggers और photographers के लिए भी यह जगह काफी आकर्षक है। नदी किनारे, पुरानी सीढ़ियाँ, मंदिर का दृश्य—ये सब बेहतरीन फोटो फ्रेम बनाते हैं। मंदिर का इतिहास और महाशिवरात्रि माना जाता है कि शंकर घाट पर भगवान शिव के मंदिर की स्थापना 1971 में महाशिवरात्रि के दिन की गई थी। Shankar Ghat का माहौल और स्थानीय संस्कृति यह स्थान Ambikapur की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा माना जाता है। शाम के समय यहाँ हल्की-फुल्की चहलकदमी, बच्चों की हंसी, और मंदिर की घंटियों की गूंज एक अलग ही माहौल बनाती है। स्थानीय लोग अक्सर यहाँ त्योहार, धार्मिक कार्यक्रम और जल से जुड़े छोटे-छोटे अनुष्ठान भी करते हैं। शंकर घाट पर क्या करें? (आकर्षण) Travel Guide – शंकर घाट कैसे पहुँचें? 📍Location Shankar Ghat, Ambikapur शहर के भीतर ही स्थित है।शहर के मुख्य इलाके से इसकी दूरी बहुत कम है तथा स्थानीय बस, ऑटो और निजी वाहन से आसानी से पहुँचा जा सकता है। 🕒 घूमने का सही समय सुबह 5:30 से 9 बजे तक – Meditation, Photography और शांत माहौल के लिए perfect शाम 4 बजे से सूर्यास्त तक – नदी किनारे का बेहतरीन दृश्य ⏳ कितना समय लगेगा? पूरी जगह आराम से घूमकर देखने में 1 से 2 घंटे काफी हैं। 🥤 खाने-पीने की सुविधा घाट के पास हल्की-फुल्की चाय-नाश्ते की दुकाने मिल जाती हैं। यदि आप प्रकृति के बीच भोजन करना पसंद करते हैं, तो यहां पिकनिक जैसा अनुभव भी लिया जा सकता है, बस स्वच्छता का ध्यान रखें। Nearby Attractions – पास में अम्बिकापुर में घूमने की जगहें (Best places in Ambikapur) Shankar Ghat के आसपास अम्बिकापुर में घूमने की जगहें हैं, जहां आप आसानी से पहुंच सकते हैं – Kali Mandir (काली मंदिर) – पास में स्थित प्रसिद्ध मंदिर महामाया मंदिर (Mahamaya Mandir) – Ambikapur का प्रमुख देवी मंदिर सांडबार मंदिर – अम्बिकापुर – रायपुर मार्ग में रिंग रोड से 4-5 किलोमीटर दूर स्थित है। Tips for Visitors Shankar Ghat – एक यादगार अनुभव अंबिकापुर (Ambikapur) में शंकर घाट (Shankar Ghat Ambikapur) एक ऐसा स्थान है जहां आस्था, प्रकृति और शांति तीनों का संतुलन मिलता है। यहाँ कुछ देर बैठकर हवा का आनंद लेना, पानी की आवाज सुनना और शांत वातावरण का अहसास करना—ये सब मन को एक नई ऊर्जा देते हैं। अम्बिकापुर में घूमने की जगहें तो बहुत सारे हैं लेकिन उन सबमें शंकर घाट का अलग ही महत्व है। सावन में प्रत्येक सोमवार, छठ पूजा महापर्व और महाशिवरात्रि में यहाँ का दृश्य देखने लायक होता है। यदि आप अभी तक शंकर घाट अम्बिकापुर नहीं आए हैं, तो आपको अवश्य एक बार इस अद्भुत जगह पर जाना चाहिए। छठ पूजा 2025 – सूर्य उपासना का पवित्र पर्व यह भी पढ़ें बांकी डैम अंबिकापुर का खूबसूरत पिकनिक स्पॉट | Banki Dam Ambikapur – Amazing Picnic Spot

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2026 में प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कैसे करें — सम्पूर्ण गाइड

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भारत में हर साल लाखों विद्यार्थी सरकारी नौकरी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। UPSC, SSC, बैंकिंग, रेलवे, डिफेंस, राज्य सेवा आयोग — हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ चुकी है कि अब केवल मेहनत नहीं, बल्कि स्मार्ट रणनीति और निरंतर प्रयास से ही सफलता संभव है।

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देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह कथा | भगवान विष्णु के शयन और जागरण की पौराणिक कहानी | Dev Uthani Ekadashi & Tulsi Vivah Katha in Hindi

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देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह कथा: जानिए भगवान विष्णु के चार महीने के शयन से लेकर उनके जागरण तक की दिव्य कहानी। तुलसी विवाह का महत्व, व्रत विधि, पूजा विधान और 2025 की तिथि सहित सम्पूर्ण जानकारी पढ़ें।

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छठ पूजा 2025 – सूर्य उपासना का पवित्र पर्व | Chhath Puja 2025 Puja Vidhi, Story & Significance

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छठ पूजा भारत का एक प्राचीन और पवित्र पर्व है जो सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है। यह त्यौहार मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल में बहुत श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाता है।
इस पर्व में भक्त सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करते हैं।

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